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  #11  
Old 06-04-2017, 09:59 AM
desiman7 desiman7 is offline
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Default तान्त्रिक

साथियों ! उसकी हंसी
भयानक ना होकर रहस्यमय अधिक
थी ! मैं मन ही मन काँप रहा था ,
लेकिन ऊपर से शान्त दिखने का
प्रयास लगातार कर रहा था ! तंत्र
भैरवी एक दम बेफिक्र और शांत लग
रही थी ! वह पुन: रहस्यमयी हंसी से
बोला – मैं यहाँ इस वीराने में अघोर
साधना करता हूँ , दिन में यहाँ साधना
करता हूँ दिन भर साधना चलती है !
बस रात में निकलता हूँ ! जब में
निकलता हूँ तो चारों ओर मौत का
सन्नाटा रहता है ! कोई मिलता ही
नहीं किससे बात करूँ ? किसको
अपने अनुभव सुनाऊ ? अभी – अभी
आप पर मेरी द्रष्टि पड़ी तो मैंने
सोचा चलो कोई तो मिला मन की बात
सुनने वाला ! बस आपको अपनी
झोपडी में ले आया ! फिर कुछ देर
मौन खड़े रहने के बाद पास ही पड़े
ऊनी आसन पर बेठ गया ! शरीर को
थोड़ा आराम मिला , फिर वह अजनबी
व्यक्ति ने दोनों हाथ रगड़ते हुए
रहस्यमय तरीके से मुस्कराते हुए
कहा – मेरे पास बढ़िया बिस्तर नहीं
है ! आपको अपना बेग ही सिरहाने
लगाकर सोना पड़ेगा ! आपके खाने के
लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है ! मैंने
नज़र घुमा कर देखा तो जहाँ पूजा –
पाठ का समान यहाँ वहां बिखरा पड़ा
था उसी के समीप थोड़े कुमकुम मिले
चावल और दाल पड़ी थी ! मुझे उसके
हाव – भाव कुछ पसन्द नहीं आ रहे
थे ! मन ही मन फिर वही शंका उठ
खड़ी हुई ! कहीं हम किसी पागल
औघड़ या अघोरी के चंगुल में तो नहीं
फंस गए ?
आप यहाँ क्या करते हैं ? – मैंने
पूछा !
फिलहाल तो कुछ भी नहीं , हाँ कुछ
वर्षों तक अघोर साधना अवश्य की
है ! आजकल बस विश्राम करता हूँ !
अचानक वह बोला – अच्छा आप
बैठिए मैं अभी आता हूँ ! हाँ ! तब तक
आप दोनों हाथ मुंह धो लें ! ईतना
कहकर वह बिजली की गति से बाहर
निकल गया ! मैं और मिन्ही स्तब्ध
से बेठे रहे ! एक अजीब सी दुर्गन्ध
और घुटन सी हम अनुभव कर रहे थे !
उस पल मेरे सामने एक के बाद एक
अनेक प्रश्न उभरते जा रहे थे , मेरे
मानस पटल पर ! एक आदमी अकेला
क्यों रहता है ? यहाँ क्या करता है ?
झोपडी में खाने की कोई वस्तु नहीं तो
फिर खाता क्या है ? कहीं अघोरी के
रूप में कोई चोर डाकू या अपराधी तो
नहीं ? अनजान मुसाफिरों को लाकर
लूटता होगा या मार देता होगा ? ना
जाने क्या करता है इस वीराने में ?
ऐसे अनेक प्रश्न मन को भयभीत
कर दे रहे थे उस समय ! मिन्ही मौन
बेठी कोई मन्त्र बुदबुदा रही थी !
बड़ी ही विचित्र स्तिथी थी !
वह विचित्र आदमी कब मेरे सामने
आकर खड़ा हो गया मुझे पता ही नहीं
चला क्योंकि मैं तो खुले हुए दरवाज़े
की ओर देख रहा था लेकिन घोर
आश्चर्य लग रहा था मुझे कि यह
कहाँ से आया होगा ? वह एक झटके
के साथ बोला – अभी ही सो जायेंगे
आप ? उसकी आवाज़ ने मेरी तन्द्रा
और विचार को एक झटके के साथ
तोड़ दिया ! हाँ , अगर नींद आ रही है
तो कोई बात नहीं ! कई दिनों से कोई
तंत्र का जानकार व्यक्ति नहीं मिला
अगर आप आज्ञा दें तो एक दो बातें
करके मन हल्का करलूं ! वैसे इधर
कोई भी आदमी आता जाता नहीं है !
यह स्थान ही कुछ ऐसा है ! बस मैं
अपनी बात जो मेरे अनुभव भी हैं
सुनाना चाहता हूँ और हाँ उसके बाद
यह स्थान सदा के लिए छोड़कर
चला जाऊंगा ! अगर आप मेरी बात
सुन लेंगे तो मुझे काफी शांति मिलेगी !
एक श्वास में उसने अपनी इतनी
सारी बातें कर डालीं ! उस व्यक्ति के
हाव – भाव पहले से ही विचित्र लग
रहे थे और भय के कारण मैं और
निताई अघोरी सोना भी नहीं चाह रहे
थे ! हमने सोचा चलो इस पागल
अघोरी की कथा ही सुन ली जाये !
समय भी कट जायेगा और जैसे ही
सूर्य अपना प्रकाश प्रथ्वी पर
फैलाएगा हम चल पड़ेंगे , अपनी
मंजिल की ओर ! मैंने उसे उलझाते हुए
पिछली बात का सिलसिला जारी
रखा और पुन: पूछा – आप इस
वीरान , भयानक स्थान पर झोपडी
बना कर क्यों रह रहे हो ? उसके मुख
पर वही रहस्यमयी हंसी एक बार
फिर खिल गयी !
वह बोला – भयभीत मत होईये ! मैं
कोई चोर , डाकू या पागल नहीं हूँ ! मैं
अघोरी हूँ ! मेरी झोपडी में कोई वस्तु
इसलिए नहीं है कि अब मुझे किसी
वस्तु की आवश्यकता ही नहीं पड़ती
है ! ना मुझे गर्मी लगती है और ना
ठण्ड ! दिन भर शान से यहाँ रहता हूँ
और जब कोलाहल शांत हो जाता है तो
धधकते शमशान में घूमने निकल जाता
हूँ ! बड़ी शांति मिलती है ! शांत
वातावरण में , मैं अपना अंत स्मरण
करता हूँ , क्योंकि मैं अघोरी हूँ !
उसकी बात बीच में काटते हुए तंत्र
भैरवी मिन्ही बोली – कुशोक ! साधक
को स्वार्थ या संदेह की द्रष्टि से
कभी मत देखो , तंत्र को धन की
वृष्टि से भी मत देखो क्योंकि
शमशान में साधना करने वाले अघोरी
ठोकर में ताज और मुट्ठी में आज
रखते हैं ! मिन्ही की बात बीच में ही
काटते हुए वह अघोरी बोला ...............
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  #12  
Old 06-04-2017, 09:59 AM
rocki rocki is offline
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Default तान्त्रिक

साथियों ! यह सत्य है की
तंत्र के क्षेत्र में , मैं नया तो नहीं था
, लेकिन मेरा अनुभव भी कुछ अधिक
पुराना नहीं था ! मेरा तांत्रिक जीवन
यायावर जीवन से प्रारम्भ हुआ था !
मुझे आश्चर्य हो रहा था मैंने आज
तक महाडामरी तंत्र के विषय में कभी
नहीं सुना था ! बाबा शिव अघोरी के
मुख से महाडामरी तंत्र का नाम मुझे
कुछ अजीब लगा ! मेरी जिज्ञासा
पूरी तरह इसे जानने में लिप्त हो
गयी ! मैंने अघोरी बाबा से पूछा –
कृपया मुझे इस महाडामरी विद्या के
विषय में विस्तार से बतलाएं ! शिव
अघोरी के मुख पर कुछ रहस्य से
भरी आड़ी तिरछी रेखाएं खिंच गयीं !
इसके पश्चात वह कुछ समय रुके ,
मेरे चेहरे पर खोज भरी द्रष्टि डाली ,
संभवत: वह मेरी लगन और
जिज्ञासा को चेहरे पर खोज रहे थे !
इसके बाद उन्होंने बोलना प्रारम्भ
किया – यह सम्पूर्ण चराचर जगत
– भूमंडल , चन्द्रमंडल और
सूर्यमंडल में विभाजित है ! यही
तामसिक , सात्विक और राजसिक
क्षेत्र हैं ! भूमंडल से चन्द्रमण्डल
तक जगत के बायीं ओर तमोगुणी और
दायीं ओर रजोगुणी सीमा है ! मध्य में
जहाँ दोनों सीमायें मिलती हैं वह
सन्धि प्रदेश है ! उच्चकोटि के योगी
, सिद्धों और साधकों के उधर्वगमन
का मार्ग यही सन्धि प्रदेश है ! जिसे
तंत्र मार्ग में शून्य मार्ग कहते हैं
और योग में गुह्य मार्ग कहते हैं !
तमोगुणी राज्य में तामसिक
आत्माओं का निवास है ! यही
तामसिक आत्माएं स्थूल जगत में
प्रेत , पिशाच , वेताल , यक्ष –
गन्धर्व , किन्नर आदि नामो से
जानी जाती हैं ! गुह्य मार्ग के
सामानंतर एक और मार्ग है जिसे
महाडामरी मार्ग कहते हैं ! यह
महाडामरी मार्ग प्रेत , पिशाच और
मायावी वेतालों का मार्ग है ! वे इसी
मार्ग से प्रथ्वी पर आते हैं ! शिव
अघोरी बाबा के अद्भुत ज्ञान से मैं
बेतरह प्रभावित था ! मैंने तुरन्त पूछा
– यह प्रेत लोक कहाँ है ? बाबा ने
मुस्कुराते हुए बतलाया – प्रथ्वी के
गुरुत्वाकर्षण की सीमा में स्थित
अत्यंत निम्न श्रेणी का लोक है –
प्रेत लोक ! प्रेतात्मा जिस
वातावरण में रहती है उसे वासनालोक
कहते हैं ! शिव अघोरी बाबा बतलाते हैं
– डॉ. ए.डब्लू. गेस्टन के अनुसार
अशान्त आत्माओं की गतिविधि और
उनके क्रियाकलापों को ठीक प्रकार
से समझने के लिए परामनोविज्ञान
का विस्तृत अध्ययन अनिवार्य है !
तभी हम परामानसिक जगत के
रहस्यों को अच्छी प्रकार से जान
पाएंगे ! बाबा निरंतर बोले जा रहे थे –
सत्य बड़ा कठिन है ! सोचो – स्वपन
में आपको प्यास लगती है , भूख
लगती है , कभी कभी कामवासना भी
जाग्रत होती है ! स्वप्न में ही आप
शीतल जल पीकर प्यास बुझा लेते
हैं ! स्वादिष्ट भोजन कर भूख मिटा
लेते हैं ! सुंदर स्त्रियों के साथ रमण
कर कामेच्छा को भी तृप्त कर लेते
हैं ! इस प्रकार आपकी स्वपन में
आवश्यकता और पूर्ती दोनों हो
जाती हैं ! आपकी नींद टूटने से बच
जाती है ! तनिक सोचें क्या जागने पर
आपको तृप्ति का अनुभव होता है ?
नहीं – कभी नहीं ! अगर प्यास लगी
है तो जागते ही पानी पीयेंगे ! भूख
लगी है तो जागते ही भोजन करेंगे !
इसी प्रकार जब तक हम साधना नहीं
करते तब तक भूत प्रेत , पिशाच सब
अनुभब तो होंगे , लेकिन प्रत्यक्ष
नहीं होंगे , लेकिन कठोर साधना करते
ही आप इन सब को देख पाते हैं !
इनसे काम भी ले पाते हैं ! समझ गए
ना साधक ? अच्छा चलो आपको
कुछ व्यावहारिक अनुभव कराते हैं !
शिव बाबा अघोरी ने मेरा हाथ पकड़ा
ही था कि मुझे किसी ने बलपूर्वक
हिला दिया , देखा तो सामने मिन्ही
खड़ी थी !
ओह ! मिन्ही तुमने अनजाने में यह
क्या कर दिया ? मिन्ही ने अपनी
छोटी – छोटी आँखें मिचमिचाते हुए
धीरे से कहा – साधक ! मैं समझी कि
सो गए लेकिन तुम तो भूतकाल में खो
गए ! मैंने स्वीकृति में अपना सिर
हिला दिया ! मिन्ही ! अभी कुछ देर
पहले बाबा शिव अघोरी के साथ था !
बड़ा ही अद्भुत ज्ञान दे रहे थे !
मिन्ही ने मुस्कराकर कहा – क्या
महाडामरी तंत्र का ज्ञान दे रहे थे ?
हां ! और आश्चर्य के साथ मेरी आँखे
फटी की फटी रह गयीं ! मैंने पूछा –
मिन्ही तुम्हे किस प्रकार यह सब
पता चला ? कुशोक ! यह भी गुरु कृपा
का प्रसाद है ! मुझे तंत्रगुरु ने जो
अद्भुत तंत्र ज्ञान दिया है , यह
उसका एक छोटा सा भाग है ! ओह
मिन्ही .....मिन्ही ......मिन्ही तुम
कितनी महान हो ! मुझे भी यह ज्ञान
सीखना है ! ठीक है , पुरुषार्थ करो
क्योंकि उपनिषद् का यह सूत्र इसी
ओर संकेत करता है – सहवीर्य
करताव हैं ! जेतीस्व नावधीतमस्तु !
इस बात को भली भांति समझ लेना
होगा ! सतही ज्ञान साधक को
बरबाद कर देता है , जबकि प्रमाणिक
ज्ञान साधक को ज्ञानी , सिद्ध की
श्रेणी में लाकर खड़ा कर देता है !
तंत्र मार्ग की ओर , साधना मार्ग
की ओर चलने के लिए साधक के
भीतर आनन्द चाहिए , उल्लास
चाहिए , प्रेम चाहिए , सरलता चाहिए
और भीतर कुछ सीखने की कुछ करने
की आग होनी चाहिए ! खेर अभी तो
तुम भोजन करलो ! मैं तुम्हारे लिए
कुछ भुने अल्लू ( आलू ) और
गरमागरम कहवा लायी हूँ ! हम दोनों
भोजन करने में लग गए ! द्वार पर
खड़ी जिस्सी हमे ठोड़ी पर अंगुली
रखे घूर रही थी .........
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Old 06-04-2017, 10:00 AM
gabbar gabbar is offline
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Default तान्त्रिक

धीरे – धीरे उस
रमणी की आकृति स्पष्ट होती जा
रही थी ! कम आयु की वह सुन्दर
रमणी थी ! चंपा जैसा रंग था मांसल
शरीर का और उसपर चम्पई रंग
सुगठित शरीर पर लिपटी हुई थी
गुलाबी ओर सफ़ेद रंग की फूलदार
मेखला ! उन्नत उरोज़ , उद्दाम
यौवन से तरंगित देह – यष्टि , पीठ
तक बिखरे हुए घने काले बाल , दीपक
के मंद प्रकाश में जगमग करता
उज्जवल रूप , फूल जैसे कोमल गालों
पर बिखरे लावन्य के कण , रतनारी
आँखें किसी शायर की कल्पना से परे
अप्रितम सौन्दर्य ! देवकन्या जैसी
उस नवयौवना को देखकर खुदा भी
बहक जाये , आदमी क्या है ? मेरा
विस्मित होना स्वाभाविक ही था !
उस नवयुवती की मनमोहक छवि
देखकर कुछ ऐसा लगा कि जैसे वह
इस संसार से दूर किसी अनजाने
लोक की देवकन्या हो ! मेरा अनुमान
सत्य निकला ! वह तंत्र भैरवी थी !
अघोरी बाबा की भैरवी ! मैं आपा
खोकर भैरवी की और ना जाने कब
तक अपलक निहारता रहा ! तंत्र
भैरवी का रूप यौवन और उसकी
बांकी छवि मेरे गर्म खून में निरन्तर
घुलती जा रही थी ! कांपते प्राणों से
एकनज़र देखा अघोरी बाबा की ओर !
कैसी सम्मोहक छवि थी ! तंत्र भैरवी
की आँखों में विचित्र सा सम्मोहन
उतर आया था ! उसके गुलाबी होंठ
धीरे – धीरे फड़क रहे थे ! जवाकुसुम
जैसे गालों पर धधकती आग की लपट
खेल रही थी जैसे ? आखिर तुम आ ही
गयीं पूरे छ महीने प्रतीक्षा करनी
पड़ी है मुझे ! अघोरी बाबा महाकाल
बोले ! मुझे भी तो प्रतीक्षा करनी
होती है ! तंत्र भैरवी ने कटाक्ष करते
हुए उत्तर दिया ! उसके स्वर में
आक्रोश था ! अब किसी को
प्रतीक्षा नहीं करनी होगी , न तुम्हें,
न मुझे ! आज तुम्हे लेने आयी हूँ मैं !
तुम्हे मेरे साथ चलना ही होगा ! उसी
आक्रोश भरे स्वर में बोली वह ! नहीं
, अभी नहीं ! अघोरी बाबा महाकाल
बोले ! – अघोरी बाबा कांपते हुए स्वर
में दूर हटते हुए बोले ! पुरवा हवा की
सांय – सांय रौरव शोर उत्पन्न कर
रही थी ! मध्यम प्रकाश में उस
वीरान मैदान में पिशाच जैसा लगा वह
अघोरी बाबा महाकाल ! आँखें गडाकर
देखने का प्रयत्न किया मैंने और
फिर जैसे रीड की हड्डी तक एक
हिमप्रवाह दौड़ गया ! मन सशंकित
होने लगा ना जाने कौनसी अनजानी
घटना घटने वाली है इस वीराने में ?
भय और संशय से बुरी दशा हो रही
थी मेरी !
मैंने भयभीत नज़रों से तंत्र भैरवी
तारा की और देखा ! वह एकदम
सामान्य थी ! वो घटनाओं को ऐसे
देख रही थी जैसे कोई मनोरंजक
चलचित्र देख रही हो ! एकाएक उस
रूपसी भैरवी का चेहरा कठोर हो
गया ! लोहे जैसा रंग उतर आया उस
पर ! बोली – अब मैं तुम्हे नहीं
छोडून्गी ........... उसके मुख की
कठोरता दूसरे ही पल पैशाचिक
मुस्कान में बदल गयी ! रुको .. अघोरी
बाबा ने चिल्लाकर कहा और वह
हमारी ओर देखकर कहने लगे – देखा
तुमने ऐसी होती है तंत्र भैरवी ! मैंने
गलती की जो एक दुष्ट आत्मा को
अपनी भैरवी बनाने का असफल
प्रयत्न किया ! आज से छ माह पूर्व
मैंने यहीं इस दुष्ट आत्मा को कैद
करने का प्रयत्न किया ! तब तो मैं
असफल रहा ! आज जब मैं तुम्हे कुछ
दिखाने के उद्देश्य से तंत्र क्रिया
कर रहा था , तो यह अचानक प्रगट
हो गयी ! काश ! मैंने पहले इसके
परिणाम को समझ लिया होता ! हमने
देखा उस भैरवी के दोनों हाथ अघोरी
बाबा महाकाल की गर्दन की और
बड़ने लगे और दूसरे ही पल उसकी
जैतून की सी अंगुलियाँ संडासी की
तरह गर्दन को कसने लगी ! अघोरी
बाबा महाकाल ने बुझी – बुझी निगाह
से भैरवी की ओर देखते हुए भय और
आतंक के मिले जुले स्वर में कहा ....
यह .... यह .....क्या अनर्थ कर रही
हो तुम .........? इसके पश्चात उनका
स्वर टूट गया ! भयातुर गले से
उन्होंने कुछ कहना चाहां – किन्तु
फटे गले से गो – गो का स्वर ही
निकला ! एक अस्पष्ट सा प्राण
कंपा देने वाला चीत्कार कर वह कटे
वृक्ष की तरह वीराने की ज़मीन पर
गिर पड़ा ! भय की अधिकता से उसके
प्राण निकलने को हो गए ! मेरे प्राण
मानो बर्फ हो गए जैसे ! नसों –
नाढ़ीयों में रक्त प्रवाह रुकता हुआ
सा अनुभव होने लगा ! दूसरे ही पल में
चिल्लाता ठोकरे खाता , अँधेरे में
ज़मीन पर गिरता पड़ता और फिर
सम्हाल कर उठता हुस वीरान मैदान
से बाहर लोहे के द्वार की ओर भागा !
मेरे पीछे – पीछे तंत्र भैरवी तारा
भागी और उसने मुझे कसकर पकड़
लिया ! चिल्लाकर बोली – तुम भाग
नहीं सकते ! यह तामसी शक्ति तुम्हे
भागने नहीं देगी ! इससे बचने का
केवल एक ही मार्ग है – भयरहित
होकर इसका सामना करना ! वह मुझे
पकड़कर भीतर ले आई ! लड़खडाता
हुआ मैं वीरान मैदान में पंहुचा ! वहां
भैरवी खड़ी थी और अघोरी बाबा
महाकाल बेसुध प्रथ्वी पर पड़े थे !
तंत्र भैरवी तारा ने उसको ललकारते
हुए कहा – सावधान ! अब तक जो
तुमने किया हमने मौन रहकर देखा ,
लेकिन अब तुम्हारा आतंक अपनी
सीमा लाँघ चुका है ! अब तुम्हे मझसे
झूझना होगा ! तंत्र भैरवी होना किसी
भी स्त्री साधिका के लिए गर्व की
बात है , लेकिन तुम जैसी तामसिक
वृति की भैरवी होना बेहद शर्म की
बात है ! अब तक तुम अपने जितने भी
प्रहार कर सकती थीं कर चुकी हो ,
अब मेरे तंत्र प्रहार झेलो ! इतना
कहकर तंत्र भैरवी तारा ने अपने
वस्त्रों को लपेट लिया और तेज़ी से
पीपल के वृक्ष की ओर भाग
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totapuri totapuri is offline
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thnx for update..... waiting for more
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kaamdev kaamdev is offline
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Old 06-04-2017, 10:02 AM
totapuri totapuri is offline
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साथियों ! मैं तंत्र भैरवी
तारा के चेहरे पर संतोष के साथ पीड़ा
के लक्षण स्पष्ट देख रहा था ! मैं
भैरवी तारा की सहन शक्ति और
ज्ञान से अब तक पूरी तरह
प्रभावित हो चुका था ! मेरे ह्रदय में
बार – बार यही बात आती थी , क्या
भैरवी इतनी सहनशील और
ज्ञानवान होती हैं ? संशय की कोई
सम्भावना नहीं थी ! प्रमाण के रूप में
तंत्र भैरवी तारा हमारे सामने थी !
सोच रहा था जिस प्रेत बाधा को दूर
करने में अच्छे – अच्छे तांत्रिक
असफल हो जाते हैं , तंत्र भैरवी तारा
ने कितनी सरलता से उस बाधा को
शांत कर दिया है ! भैरवी तारा का एक
हाथ अब भी सामने की और संकेत
कर रहा था ! मैंने और उस अघोरी
बाबा ने उस और देखा तो आँखें
आश्चर्य से फटी की फटी रह गयीं !
मेरा सारा शरीर कांप गया ! अघोरी
बाबा ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मेरा
साहस बढाया ! हम तीनो भयमिश्रित
आश्चर्य से उस ओर देख रहे थे !
उसकी किसी भी जीवित प्राणी से
कोई समानता नहीं थी ! कद्दू जैसा
गोल और बड़ा सा माथा , काफी ऊँचा
ललाट , दो बड़ी – बड़ी गोल गोल ,
मोटी – मोटी आँखें , एकदम सपाट था
माथे के नीचे का भाग ! केवल मुख था
और वह भी एक लम्बा फांक जैसा !
कानो के स्थान पर दो ऊंचे गुमढे से
थे और उन्हीं के समीप लम्बे लम्बे
बालों की सन जैसी सफ़ेद जटाएं !
किसी झींगुर की मूछों की तरह ! बेहद
छोटा गला ! हाथ के पंजों मैं 06 – 06
अंगुलियाँ थी और काफी लम्बे –
लम्बे नाख़ून थे ! उस विलक्षण
प्राणी की देह पर वस्त्र थे या नहीं
या उसके शरीर का गठन ही उस
प्रकार का था , यह समझ पाना
अत्यंत कठिन था ! कारण कि अगर
वस्त्र पहने थे , तो उसके वस्त्र
बदन से एकदम चिपटे हुए थे ! छाती
और पेट का आकार नगाड़े जैसा था !
इसके पश्चात वह सीधा हमारी और
सरक आया ! मैंने भैरवी तारा और
अघोरी बाबा से पूछा – यह क्या बला
है ? अघोरी बाबा ने मुस्कुराते हुए
कहा – उजाड़ वीराने में अथवा
शमशान में यह शक्तियां साधक को
प्राय: घूमती मिल जाती हैं ! यही वह
शक्तियां हैं जो साधना के समय
साधक का अहित करती हैं ! उन्हें
भयभीत करती हैं ! मैं आपसे पूछता हूँ
– उस भयानक आकृति को देखकर ,
क्या उस समय आपकी आँखें
विस्फारित नहीं हो जातीं ? मुख
मण्डल पीला नहीं पड़ जाता ? आपके
ह्रदय की धड़कन तेज़ ना हो जाती ?
गहरा धक्का लगने के कारण क्या
आप भय से कांपने नहीं लगते – सिर
से पैर तक ? वह वीभत्स द्रश्य
देखकर भय , दुःख और संताप से
क्या आप परेशान ना हो उठते ? क्या
आप भी यही न सोचते कि हाय , यह
कैसी आफत हमारे ऊपर आन पड़ी
है ? हम पर भी ठीक यही प्रभाव हुआ
था ! इस विलक्षण द्रश्य के सदमे
से तंत्र भैरवी तारा को छोड़कर हम
दोनों धम्म से नीचे बेठ गए और दुःख ,
भय तथा व्याकुलता से सोच में डूब
गए !
तंत्र भैरवी तारा एकदम निश्चिन्त
थी ! उसने हम लोगों को भी साहस
रखने का निर्देश दिया और स्वयं
तंत्र सुरक्षा कवच बनाकर मन्त्र
जाप में जुट गयी ! घोर आश्चर्य धीरे
– धीरे वह भयानक आकृति मन्त्र
शक्ति से स्वयं ही पीछे हटने लगी
और देखते – देखते अँधेरे में कहीं खो
गयी ! तारा ने आश्वस्त होकर मन्त्र
जाप बंद कर दिया और हमारी और
देखते हुए बोली – यह उजाड़ , वीराना
है ! इसमें और शमशान में कोई विशेष
अन्तर नहीं है ! यह दोनों ही समान
रूप से भयभीत करने वाले हैं ! तभी तो
तंत्रगुरु कहते हैं , - शमशान साधना ,
वीराने में साधना या शव साधना में
तंत्रगुरु को सदैव साथ रखो ! मैंने
आश्वस्त होते हुए पूछा – हम वीराने
में या शमशान में तंत्र – मन्त्र
साधना करे ही क्यों ? भैरवी तारा
मुस्कुराते हुए बोली – इसका भी
अपना कारण है ! वह मैं समझती हूँ
ध्यानपूर्वक सुनो ! शमशान के
विषय में यह आम धारणा है कि वहां
अशान्त आत्माएं और भूत – प्रेत
होते हैं ! कहा भी गया है – पुनर्जन्म
के लिए मोक्ष आवश्यक है , और
मोक्ष का मार्ग शमशान घाट से ही
प्रारम्भ होता है ! जीवन से मुक्ति के
लिए और नया जीवन पाने के लिए
शमशान अथवा वीराने को समझना
और जानना अनिवार्य है ! तभी तो
शमशान को विश्रामघाट , निगमबोध
, शांतिधाम और मुक्तिधाम जैसे नामो
से जाना गया है ! शमशान में भटकती
अशान्त आत्मा के लिए मोक्ष की
एक खिड़की पुनर्जन्म के रूप में
खुलती है ! यह शरीर पांच तत्वों से
निर्मित है ! प्रथम प्रथ्वीतत्व
जिसका बीज ‘ लं ‘ है ! दूसरा जल
तत्व जिसका बीज ‘ वं ‘ है ! तीसरा
अग्नि तत्व जिसका बीज ‘ रं ‘ है !
चतुर्थ वायु तत्व जिसका बीज ‘ यं ‘
है !पंचम आकाश तत्व जिसका बीज ‘
हं ‘ है ! यह हमारा शरीर है ! तंत्र
भैरवी तारा धाराप्रवाह बोले जा
रही थी ! प्रत्येक कार्य , व्यव्हार
के लिए सकारात्मक उर्जा की
आवह्य्कता पड़ती है और ऐसी उर्जा
के लिए तंत्र भैरवी और शमशान को
..?
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  #17  
Old 06-04-2017, 10:03 AM
kamina_pati kamina_pati is offline
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Thanx Komal ji
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  #18  
Old 06-04-2017, 10:03 AM
gabbar gabbar is offline
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हमारे अशांत मन में यही बात रह
रहकर कोंध उठती थी कि अब तंत्र
भैरवी तारा क्या करेगी ? क्या वह
कोई भीषण तंत्र का उपाय करेगी
अथवा कृत्या का मारक प्रयोग
करेगी ? हम सब का मन बेहद अशांत
और क्लान्त था ! तंत्र भैरवी तारा
तेज़ी से भाग कर पीपल के पेड़ के
नीचे पंहुची और एक ज़ोरदार झटके
से पीपल के पेड़ की नर्म डाली तोड़
ली ! और इसके पश्चात फिर तेज़ी से
एक बार मुड़ी और तेज़ी से अघोरी
बाबा की दुष्ट भैरवी की और लपकी !
बड़ा ही रोमांचक द्रश्य था ! मैं
अचानक ही बोल पड़ा – हे महाकाल !
अब क्या होगा ? ठीक उसी समय
वातावरण में अजीब से स्वर सुनाई
देने लगे ! इ sssssssss ची ssssssssss
सी sssssss यह स्वर आपस में
गड़मढ़ थे ! फिर एक भय और आतंक
से भर देने वाली ध्वनि उभरने लगी !
तभी आ ....ह sssssss ऐसी दर्द से
भरी चीख उभरी जैसे कोई भीषण
दर्द से छटपटा रहा हो ? चारों और
के वातावरण को धूल – गर्द के
बवनडर ने बेतरह घेर रखा था , किन्तु
वीराने से बाहर का पूरा क्षेत्र शांत
था ! इसके बाद ओ ..ओ .... ओ ... का
दर्द से भरा स्वर सुनाई दिया !
अचानक यह आवाज़ बड़े ही भयानक
ढंग से तेज़ स्वर में एक साथ उभरने
लगीं ! हम सब का भय के मारे बुरा
हाल था ! सबके चेहरे निस्तेज हो चुके
थे और सूखे होंठो पर केवल महाकाल
का नाम था ! तंत्र भैरवी तारा उस
मन्त्रसिक्त पीपल की डंडी से
अघोरी बाबा की भैरवी को बेतरह पीट
रही थी ! दूर किसी डाल पर बेठा
उल्लू बेतरह चीख उठा , देखते देखते
अघोरी बाबा की भैरवी मूर्छित होकर
गिर पड़ी ! तभी अघोरी बाबा ने
चिल्लाकर कहा – इसे शीग्र ही
दक्षिण दिशा में वीराने के द्वार के
समीप दफना दो ! हम सब ने ठीक
ऐसा ही किया ! तंत्र भैरवी तारा अब
तक सौम्य हो चुकी थी उसने हमारी
और देखकर कहा – तंत्र के संसार में
यह सब सामान्य बातें हैं ! अघोरी
बाबा अब तक सामान्य हो चुके थे ,
उन्होंने तंत्र भैरवी तारा का आभार
प्रकट किया और वहां से प्रस्थान
करने की अनुमति मांगी ! हमे अभी
और भी प्रयोग करने थे सो हमने
मना नहीं किया ! अघोरी बाबा धीरे –
धीरे सधे हुए क़दमों से वीराने की
सीमा से बाहर चले गए !
उस वीराने में अब हम चार ही लोग
शेष थे ! मैं , तंत्र भैरवी तारा , अघोरी
बाबा और पीड़ित व्यक्ति ! हम सब
से बेखबर तंत्र भैरवी तारा अपनी
अद्भुत तांत्रिक क्रियाओं की तैयारी
में व्यस्त थी ! तैयारी पूरी होते ही
तारा ने पीड़ित व्यक्ति की और देखा
, और बोली – अब मैं अशांत आत्मा
पर भीषण प्रहार करने जा रही हूँ !
हमने स्वीकृति की मुद्रा में सिर हिला
दिया ! हमारी स्वीकृति मिलते ही
तंत्र भैरवी तारा ने मन्त्र उच्चार
प्रारम्भ कर दिया ! धीरे – धीरे
मन्त्र पाठ की ध्वनि तेज़ से तेज़
होती जा रही थी ! हमने स्पष्ट देखा ,
वीराने का वातावरण तेज़ी से बदलता
जा रहा था ! तंत्र भैरवी तारा ने
अघोरी की और संकेत किया , उन्होंने
तुरंत झोले से देसी मदिरा ,
रक्तरंजित कलेजी , गूगल की
अगरबत्ती ,कामिया सिन्दूर , कुँए
का जल और एक मोम की गुड़िया
निकालकर तंत्र भैरवी द्वारा स्वच्छ
किये गए स्थान पर रखदी ! तंत्र
भैरवी तारा अब तामसिक तांत्रिक
क्रिया के लिए पूरी तरह से तैयार
थी ! तंत्र भैरवी तारा ने अपने , हमारे
और तांत्रिक वस्तुओं के चारों और
सुरक्षा वृत खींचा ! स्मरण रहे यह
विधान सुरक्षा हेतु अनिवार्य होता
है ! दीप , अगरबत्ती प्रज्वलित कर
दिए गए ! हम सब तंत्र भैरवी के
समीप बेठे यह अद्भुत क्रिया देख
रहे थे ! मैं प्रारम्भ से ही प्रत्येक
तांत्रिक विधि को देखने , समझने
और क्यों करते हैं , ऐसी तांत्रिक
विधि को जानने का इच्छुक रहता था
, सो मैं बोल पड़ा – भैरवी तारा कुछ
इस विधि के विषय में बताओ तो
सही ! तंत्र भैरवी तारा ने खा जाने
वाली द्रष्टि से मेरी ओर देखा और
बोली – प्रश्न अच्छा है लेकिन तुमने
गलत समय का चयन किया है ! मैं
तुम्हारी जिज्ञासा को अवश्य ही
शांत करुँगी ! तंत्र की यही तो
विशेषता है प्रत्येक व्यक्ति तंत्र के
विषय में जानना चाहता , समझना
चाहता है ! तांत्रिक क्रियाओं को
देखना चाहता है ! कभी – कभी वह
स्वयं भी करना चाहता है ! साधक का
और भय का चोली दामन का साथ है !
अगर हम भय को निकाल कर
जिज्ञासा पर बल दें तो हम तांत्रिक
क्रियाओं को देख और समझ सकते
हैं ! यह अनजाना भय ही तो है जो हमे
तांत्रिक क्रियाओं को करने से
रोकता है ! खेर ! मैं तुम्हें तांत्रिक
क्रियाओं का भेद बतलाती हूँ ! तंत्र
साधना और प्रयोग की पहली और
अन्तिम शर्त है ! क्रियाओं को
गोपनीय रखना ! तुम जो भी यहाँ
देखोगे या सुनोगे उसे अपने तक ही
रखोगे ! हम सबने स्वीकृति में सिर
हिला दिया ! रात की कालिमा धीरे –
धीरे भोर की और बढ़ रही थी ! हम
जानते थे – रात जितनी भी संगीन
होगी , सुबह उतनी ही रंगीन होगी !
तंत्र भैरवी तारा ने तंत्र के अद्भुत
रहस्य परत दर परत खोलने प्रारम्भ
किये ,
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  #19  
Old 06-04-2017, 10:03 AM
rocki rocki is offline
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उस अघोरी का
मिन्ही की बात को बीच में ही काटना
मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा ! मैंने मन
ही मन सोचा कि क्यों ना इसे डांट दूँ ,
लेकिन मिन्ही ने संभवत: मेरी भावना
को समझ लिया था , इसलिए उसने
हाथ के इशारे से मुझे रोक दिया !अघोरी निताई ने भी मेरे हाथ पर
अपना हाथ रखकर संभवत: यही
संकेत दिया था ! मैंने होंठों तक आयी
अपनी बात मन में ही दबा ली ! वह
विचित्र अघोरी धाराप्रवाह बोले जा
रहा था ! साथियों ! शाक्त तंत्रों में
प्रत्येक साधक को तीन अवस्थाओं
में विभाजित किया गया है – जिन्हें
हम पाशविक – वीरतापूर्ण और
दिव्य देवी भावनाओं पर अवलंबित
मानते हैं ! इन तीन अवस्थाओं को
तांत्रिक पशुभाव – वीरभाव और
दिव्यभाव मानते हैं ! यहाँ आकर उस
अघोरी ने थोड़ा विश्राम लिया ,
उठकर पास ही रखे टूटे पात्र से जल
पिया और फिर बोलना प्रारम्भ कर
दिया – तंत्र मार्ग में भाव के पश्चात
आचार आते हैं ! यह हैं – वेदाचार –
शैवाचार –वैष्णवाचार – वामाचार –
सिद्धांताचार और सर्वप्रिय
कौलाचार ! हमारे योग्य तांत्रिकों ने
अपनी दिव्य द्रष्टि से जाना और
इसे तंत्र मार्ग में निम्न नामों से
स्थापित किया – साक्षातकार
याज्ञिक , योगिक और तांत्रिक !
इन तीनो रूपों को क्रमश:
कर्मकाण्ड – ज्ञानकाण्ड और
उपासनाकाण्ड कहते हैं ! इतना
बोलकर उस अघोरी ने एक बार
विश्राम किया जल पिया और पुन:
बोला – संभवत: हम अपने विषय से
भटक रहे हैं ! क्यों ना हम अपने मूल
विषय संस्मरण पर आ जाएँ ? मिन्ही
मध्य में ही बोल पड़ी , नहीं ऐसी कोई
बात नहीं है ! हमे पूरी रात काटनी है !
आप अभी इस प्रकार की चर्चा को
चलने दें ! मैंने भी अपनी स्वीकृति में
अपना सिर हिला दिया ! निताई
अघोरी बोला – मित्र मैं तो आपके ही
कुल का हूँ ! आपका ज्ञान मेरा
मार्गदर्शन करेगा ! ! ठीक है तो मैं
अपनी बात वहीँ से प्रारम्भ करता हूँ
, जहाँ से बात को छोड़ा था !
मैं एक तंत्र साधक घोर अघोर पंथ से
हूँ ! यहाँ कुछ समय पूर्व शव साधना
करने आया था ! यह स्थान मेरे लिए
अनुकूल था ! सोचा अपनी साधना
पूर्ण कर लूँगा लेकिन ऐसी घटना
घटी कि मेरे जीवन को स्वतंत्र कर
दिया और आज मैं हर बंधन से आज़ाद
पूर्णत: स्वतंत्र हूँ ! पूर्ण स्वतंत्र
कहकर वह अघोरी अपनी उलझी हुई
दाढ़ी को खुजाता हुआ बड़े जोर से
हंसा ! एकबारगी तो मेरा मन घबरा ही
गया उसकी कान फाड़ू हंसी सुनकर !
मैंने अविश्वास प्रकट करते हुए पूछा
– आप अघोरी हैं ? हाँ मैं अघोरी ही हूँ !
मैं दीक्षित नहीं हूँ फिर भी मैं साधक
हूँ – इतना कहकर वह निर्विकार
भाव से पाल्थी मारकर ज़मीन पर
आराम से बेठ गया ! कुछ समय तो
वह मौन रहा फिर पता नहीं क्या
सोचते हुए बोलना प्रारम्भ किया !
मित्र ! तो फिर मैं आपसे सब कुछ
खुलकर कह डालूं ? आज तक मैंने
अपने मन की बात किसी को नहीं
बतलाई और आज तक किसी से कुछ
कहने का अवसर भी तो नहीं मिला !
चलिए तो आपको आगे का वृतांत
सुनाता हूँ ! मेरे जीवन की सत्य
कथा ! मन भी कुछ हल्का हो जायेगा
जो वर्षों से एक पत्थर की तरह मेरी
आत्मा पर है ! आप लोगों को
बतलाकर मैं उस बोझ से मुक्त हो
जाऊंगा ! मैं , निताई अघोरी और तंत्र
भैरवी मिन्ही उसकी आगे की बात
सुनने के लिए सतर्क हो गए !
उस अघोरी ने पहले अपने मस्तक पर
बह आये पसीने को साफ़ किया फिर
जोर से खखार के गले को साफ़ किया
और स्पष्ट आवाज़ में बोलना
प्रारम्भ किया ! मित्रों ! मैं बचपन से
ही अनेक प्रकार की पुस्तकों और
विभिन्न विषयों को पढने में रूचि
रखता था ! उसमे भी विशेषरूप से
तंत्र- मन्त्र – यंत्र से सम्बंधित
तांत्रिकों और अघोरियों के रोचक
संस्मरण पढ़ते पढ़ते मेरा भी झुकाव
तंत्र – मन्त्र की और होने लगा !
सोचा एक दिन मैं भी वैसी ही साधना
करके सिद्धि प्राप्त करूँगा ! फिर
बहुत सारा धन , ऐशो आराम और
खूब प्रसिद्धि भी मिलेगी ! उस
समय जब सब कुछ मेरे पास होगा तो
मेरी बराबरी भला कौन कर सकेगा ?
मैंने देखा अचानक तंत्र भैरवी मिन्ही
के चेहरे का रंग बदल गया और वह
कुछ क्रुध और कुछ समझाने वाले
स्वर में बोली – मूर्ख साधक ! यही
लालच तुम्हे ले डूबा ! जब तुमको
गुरुभाई पसन्द करते हैं तो तुम एक
अच्छे विद्यार्थ होते हो ! जब
आपको दुनिया पसन्द करती है तो
तुम एक अच्छे ज्ञानी होते हो ,
लेकिन जब आपको गुरु पसन्द करता
है तो तुम एक संस्कारी अच्छे साधक
होते हो ! तंत्र के दुर्गम मार्ग पर
चलना है तो संस्कारी साधक बनिए ,
गुरु प्रिय बनिए ! मूर्ख तुम यहीं चूक
गए ! अघोरी कुछ उदास होते हुए
बोला – उस समय मुझे क्या पता था
कि ........................?? .
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दिन भर का सफ़र समाप्त करके
सूरज रात को प्रकृति की गोद में सोने
के लिए चला गया था ! जैसे – जैसे
उसकी नींद गहरी होती जा रही थी ,
उसी अनुपात में रात की काली चादर
और भी काली होती जा रही थी !
आकाश में टिमटिमाते तारे ऐसे लग
रहे थे मानो किसी रूपसी की ओढ़नी
में हीरे जढ़े हों ! दिन भर के थके हारे
लोग अपने – अपने काम निबटाकर
चारपायीओं पर विश्राम करने का
उपक्रम कर रहे थे , पर उसकी आँखों
में नीन्द का नामोनिशान नहीं था ! वह
चारपायी पर इस प्रकार लेटी थी
मानो नीन्द और उसका आपस में बैर
चल रहा है , पर समय का पहिया तो
आगे बढ़ना ही था ! पल मिनटों में और
मिनट घंटों में बदलकर कब रात के
बारह बज गए उसे कुछ पता ही नहीं
चला था !
थोड़ी देर पहले जिस आकाश में तारे
टिमटिमा रहे थे , अब वहां बादलों के
टकराने और बिजली के कोंधने की
तेज़ आवाजें आने लगीं थीं और थोड़ी
देर बाद ही बादलों की गोद से पानी
की मोटी – मोटी बूँदें टपकने लगी थीं !
तेज़ वर्षा होने लगी थी और सांय –
सांय करता पानी , हवाओं के आवारा
झोंकें हर पल अपनी गति बढ़ाते चले
जा रहे थे !
अपने मन में एक पक्का निश्चय
लेकर वह अपनी चारपायी से उठी
थी ! दूर कहीं सियारों के चीखने की
बेसुरी आवाजें वातावरण को और
भयानक बना रही थीं ! धीरे – धीरे
उठकर वह दरवाजे तक आयी और
धीरे से दरवाजे की कुंडी खोलकर कब
बाहर निकल गयी किसी को पता नहीं
लगा ! तेज़ बरसते पानी में वह गाँव
की पगडंडी पार कर निरंतर आगे
बढती चली गयी !
कभी घर से बाहर कदम न रखने वाली
औरत घनघोर काली रात और तेज़
बरसात में तेज़ी से चली जा रही थी ,
यंत्रवत किसी भी अप्रिय घटना से
बेखबर ! संभवत: उसकी सोचने –
समझने की शक्ति जवाब दे गयी थी
अन्यथा वह भला ऐसा दुस्साहस
कैसे कर सकती थी ? वह कब चलते
– चलते शमशान में पंहुच गई उसे कुछ
पता ही नहीं चला ! किसी सूखे पेढ पर
बैठा उल्लू सहसा अपनी मोटी –
मोटी भावशून्य आँखें फाड़कर चीख
उठा ........ घू ....... घू ........ !
थोड़ी देर बाद एक कुटिया के सामने
पंहुचकर वह रुक गयी थी ! कुटिया में
एक अघोरी आसन लगाये बैठा था !
मानव खोपड़ी में रखे किसी तरल
पदार्थ से आने वाली तेज़ बदबू उसके
नथुनों में भर गयी थी ! धूने के आस –
पास फैली विभिन्न आकारों की
हड्डियाँ बेतरतीब पढ़ी थीं ! वह
अघोरी मन – ही – मन कुछ बुदबुदा
रहा था और वह उसके सामने बैठी
अपलक उस विलक्षण अघोरी की
तरफ देख रही थी !
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